"श्रीराधाकृष्णाभ्याम नम:",जहाँ कहीं श्रीकृष्ण की पूजा होती है,श्रीराधा के साथ होती है,यह तो प्रसिद्ध है,परन्तु कृष्ण चरित्र निरूपक ग्रंथों में श्री मद्भागवत सबसे प्रसिद्ध है,इसमें श्री राधा की चर्चा प्राय: नहीं सी ही है,इससे कुछ लोगों के मन में यह सन्देह होने लगा है कि राधा की उपासना कृष्णोपासना से बहुत नवीन है।
जबसे पाश्चात्य विद्वानों ने पुराणों को रद्दी कपोल कल्पित कह कर हटा दिया है,तबसे उनके शिष्य हमारे देशी भाई भी इन समूल्य ग्रन्थ रत्नों की ओर दृकपाप समझने लगे। अब पर्गिटर साहब की कृपा पुराणो की तरह हुयी है,उनका कहना है कि पुराणों की सहायता के बिना भारत वर्ष के इतिहास का संकलन असम्भव प्राय: सा है। इससे अब आशा होती है कि हमारे देशी भाइयों की भी इन ग्रन्थों की ओर कृपा द्रिष्टि फ़िरेगी।
देवी भागवत देखने से श्रीराधा का दर्जा बहुत ऊंचा हो जाता है,इस पुराण के अनुसार राधा केवल बरसानानिवासी वृषभानु की पुत्री मात्र नहीं है,जैसे श्रीकृष्ण परमात्मा के अवतार है,वैसे ही श्री राधा भी पराशक्ति अवतार है,आद्या प्रकृति के पांच रूप है,दुर्गा,राधा,लक्ष्मी,सरस्वती,और सावित्री (देवी भागवत ९/१/१)
"गणेशजननी दुर्गा राधा लक्ष्मी: सरस्वती,सावित्री च सृष्टिविधौ प्रकृति: पंचधा स्मृता"
राधा कृष्ण की चिच्छाक्ति है,इन्ही के संयोग से ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुयी है,इस ब्रह्माण्ड को श्रीराधाजी ने जल में डाल दिया इस पर अप्रशन्न होकर श्रीकृष्ण ने शाप दिया कि आज से तुम अनपत्या होगी,इत्यादि कथा नवम स्कन्ध के द्वितीय अध्याय में वर्णित है।
इस कथा को कपोल कल्पित कहिये या जो कुछ कहिये इतना तो मानना पडेगा कि राधा की उपासना बहुत आधुनिक नही है,और राधा का दर्जा प्रधान शक्तियों में है,जो दर्जा लक्ष्मी,पार्वती सरस्वती का है वही श्री राधा का है। असल बात तो यह है कि जितने देव हमारे यहां माने गये है,और पूजनीय समझे जाते है,सबों के साथ उनकी अपनी अपनी शक्तियों की भी पूजा आवश्यक बतलायी गयी है,यहां तक कि पूजन विधि में शक्तियों का ही उल्लेख पहले आता है,जैसे-
श्रीगौरीशंकराभ्याम नम:,श्री लक्ष्मीनारायणाभ्याम नम:,श्री राधाकृष्णाभ्याम नम:,श्रीसीतारामाभ्याम नम:।
कई तरह के प्रश्न मनुष्य के मन में उपस्थित होते है,उनके प्रश्न और जबाब कुछ इस प्रकार से है:-
प्रश्न:-राधा तत्व क्या है? उत्तर:-राधा तत्व के सम्बन्ध बहुत से विषय है,जैसे राधा स्वरूप,मृत्यु लोक में उनके अविर्भाव का कारण आदि कहे जाते है,इनके लिये माना जाता है कि सीता राधा दुर्गा यह सब विभिन्न नही है,यह मूलत: एक ही है,उद्देश्य भेद से उनके कई रूप प्रस्तुत किये गये है,सीतोपनिषद में जो रूप सीता का प्रस्तुत किया गया है वही राधा का है,वेद अनन्त है और साधु शब्द ही वेद का पार्यायवाची है,अत: कई लोग कहते सुने जाते है कि "अमुक कथन वेद मे है अमुक कथन वेद में नही है",यह कथन बहुत सावधानी से कहना चाहिये। वेदों में सभी विषय बीज भाव से और सामान्य भाव से कहे गये है,बीज और सामान्य भाव वाले वाक्यों को बहुत ही सावधानी से और चेष्टा से समझने वाली बात है। वेद में जिस उमा नाम से गान किया गया है वही ब्रह्मविद्या में राधा नाम से जाना जाता है,ब्रह्मविद्या सदैव परमात्मा के साथ उपस्थित होती है। वेदों में जो सोम नाम का शब्द आया है उसके ऊपर गौर से विचार किया जाये तो "कृष्णयजुर्वेद" में एक मन्त्र का उल्लेख किया गया है- आक्रान्त समुद्र: प्रथमे विधर्मन,जनयन प्रजा भुवनस्य राजा।
वृषा पवित्रे अधि सा नो अव्ये बृहत सोमो वावृषे सुवान इन्द्र:॥
वेद के त्रिसुपर्ण-मन्त्र में उमा अर्थात ब्रह्मविद्या के साथ वर्तमान सोम का उल्लेख आता है,परमात्मा ने श्रीकृष्णावतार में जो प्रेम भक्ति परिपालिनी लीला की है,त्रिसुपर्ण-मन्त्र में उसकी शोभा वर्तमान है।
